नाग लक्ष्मी मंत्र साधना नाग दोष राहु दोष निवारण
नाग लक्ष्मी सिद्ध यँत्र माला पारद श्रीं यन्त्र स्थापित कर के मंत्र साधना करनी चाहिए।
‘ॐ नमो नागलक्ष्म्यै पातालनिवासिन्यै नमः’) और स्तोत्रों का जाप किया जाता है, जो नागों से जुड़ी शक्तियों को जागृत करते हैं।
प्रमुख नाग लक्ष्मी मंत्र (Mantra for Nag Lakshmi)
कालसर्प दोष निवारण मंत्र:
“ॐ नागलक्ष्म्यै नमः। कालसर्पदोष नाशाय, जन्मकुण्डली शोधनाय। राहुकेतुभयहराय, नागलक्ष्म्यै नमो नमः॥”
(यह मंत्र कालसर्प दोष और राहु-केतु के भय को दूर करने के लिए है).
पटलवासिनी मंत्र: “ॐ नमो नागलक्ष्म्यै पातालवासिन्यै नमः। अनन्तेशप्रिया देवि शुद्धसत्त्वस्वरूपिणि॥”
(यह देवी को पाताल लोक की स्वामिनी और शुद्ध सत्त्व स्वरूपिणी कहकर नमन करता है).
नागेश्वरी मंत्र (ग्रह शांति के लिए): “नागेश्वरि नमस्तुभ्यं कुरु मे ग्रहसौम्यता॥”
(ग्रहों को शांत करने और सौम्य बनाने के लिए).
श्रीनागराजराजेश्वरी नागमहालक्ष्मी स्तोत्र
(पूरा श्लोक – अंश)
यह स्तोत्र नाग लक्ष्मी के विभिन्न रूपों का वर्णन करता है और उनसे सुरक्षा मांगता है:
“नागलक्ष्मी शिरः पातु, ज्ञानशक्ति प्रदायिनी।” (नाग लक्ष्मी मेरे सिर की रक्षा करें, ज्ञान शक्ति प्रदान करें).
“हृदये कुण्डली रक्षेत्, नाभौ श्रीशेषवासिनी।” (हृदय में कुण्डलिनी और नाभि में शेषनाग निवास करें).
“बाहुयोः विषहरा पातु, पृष्ठे नागमातृका।”
(भुजाओं में विषहरा और पीठ पर नागमाता रक्षा करें).
( हिन्दी अनुवाद सहित)
02..🌷🌷॥ श्रीनाग लक्ष्मी कवचम् ॥ 🌷🌷🌷
03..🌷🌷नागलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली 🌷🌷🌷
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01..🌷🌷श्रीनागराजराजेश्वरी नागमहालक्ष्मी स्तोत्रम् 🌷
शास्त्रों में भगवान महाविष्णु के एक रूप जिन्हें भगवान
अनंत/संकर्षण/आदिशेष आदि कहा जाता है
यह मूर्ति दिव्य रूप पाताल से भी नीचे विराजमान हैं। उन्हें भगवान परमविष्णु के ५ मुख्य रूपों में से एक रूप माना जाता है।
यह पांचवां रूप स्थूल और तमोगुण का अधिष्ठाता है।
प्रलय काल में इनकी ही भुकुटि से कालाग्नि रूद्र की उत्पत्ति होती है। यही कालराज और महासंकर्षण भी है।
यह प्रभु अपने एक रूप से पाताल में स्थित है और दूसरे रूप
से भौतिक ब्रह्माण्ड में विराट रूप में सूक्ष्म रूप से व्याप्त है।
यह दस दिग्पाल में से एक पाताल के दिग्पाल है इन्हें ही
जगदाधार कहा जाता है क्योंकि यह ही समस्त ब्रह्माण्डों
का आधार स्तम्भ है।
इन्हीं सर्व शक्तिमान की पत्नी और शक्ति देवी नागलक्ष्मी है।
यह महाकुंडलिनी त्रिशक्ति रूपा है ।
(यह देवी ही अपने दूसरे अन्य उग्र प्रचंड तांत्रिक रूप में पाताललक्ष्मी और अघोरलक्ष्मी भी कहलाती है ।उन स्वरूप की
पूजा साधना घर में गृहस्थ लोग नहीं करते।
जबकि नागलक्ष्मी सौम्य रूपा है घर में पूजित है)
लक्ष्मण जी और बलराम जी की पत्नियां नागलक्ष्मी का अवतार थीं
लोकपरंपरा से निर्मित इस स्तोत्र में मां नागलक्ष्मी से जन्म कुंडली के दोषों और अशुभ ग्रहों की पीड़ाओं से रक्षा की प्रार्थना की गई है।
यह स्तोत्र मुख्य रूप से कालसर्प दोष, राहु-केतु, शनि बाधा, कुंडली दोष, एवं गूढ़ ग्रह बाधाओं के निवारण हेतु मां नागलक्ष्मी से की गई एक प्रार्थना है।
दीपावली के एक दिन पूर्व कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को
नाग दीपावली भी कहते हैं। माना जाता है इस दिन नागलोक में माता नागलक्ष्मी का पूजन किया जाता है।
नाग लक्ष्मी पूजा में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी दोनों की
एक साथ पूजन स्मरण करें।
भगवान विष्णु को तुलसीपत्र और मां लक्ष्मी को बेलपत्र चढाये। नागलक्ष्मी को दूध और उससे बने मिष्ठान का
भोग लगाएं। अनारदाना आंवला ऋतुफल सुगंधित पुष्प/इत्र
चढ़ाए.।
🌷🌷श्रीनागराजराजेश्वरी नागमहालक्ष्मी स्तोत्रम् 🌷🌷
( हिन्दी अनुवाद सहित)
श्रीगुरू देवाय नमः।
श्रीगणेशाय नमः।
ॐ नमो नारायणाय वासुदेवाय।
ॐ ह्री नमो नारायणाय अनन्ताय श्रीं नमः।
ॐ सर्वेश्वराय सर्वविघ्नविनाशाय मधूसुदनाय ठ: ठ:।
संकल्प
ॐ सर्वग्रह दोष निवारणं, कालसर्प पीड़ा शमनं, चित्तशुद्धि, समृद्धि, और नाग लक्ष्मी कृपा प्राप्त्यर्थं, अनेन साधनायामहं संकल्पयामि।”
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं नागमहालक्ष्म्यै नमः॥
ॐ पाताल वासिन्यै च विदमहे जगदाधारायै धीमहि तन्नो:
नाग लक्ष्मी: प्रचोदयात्।
ध्यानम्:
🍁श्वेतवर्णा पद्मासनस्था, नागमाल्यविभूषिता।
अष्टभुजा शंखचक्रगदा, नागलक्ष्मी नमोऽस्तु ते॥
( जो श्वेत वर्ण वाली और कमल पर विराजमान हैं
नागमणि और मालाओं से विभूषित हैं।
जो शंख चक्र गदा आदि अष्टभुजाधारी है
उन नागलक्ष्मी को नमस्कार है )
🍁ॐ नागलक्ष्मी नमस्तुभ्यं, नागराजायते नमः।
सर्पिणी सुरम्यवक्त्रे, नागभक्तिप्रदायिनि॥
कालसर्पदोष नाशाय, जन्मकुण्डली शोधनाय।
राहुकेतुभयहराय, नागलक्ष्म्यै नमो नमः॥
(नाग लक्ष्मी, आपको प्रणाम।
आप नागराज की शक्ति हैं, जो नाग भक्तों को अनुग्रहित करती हैं।
कालसर्प दोष और जन्मकुंडली के दोषों को दूर करने वाली, राहु-केतु के भय को हरने वाली नाग लक्ष्मी को मेरा नमन।)
🍁ॐ नमो नागलक्ष्म्यै पातालनिवासिन्यै नमः।
अनन्तेशप्रिया देवि शुद्धसत्त्वस्वरूपिणि॥१
भावार्थ:
हे नाग लक्ष्मी! पाताल लोक में निवास करने वाली, अनंत शेष की प्रिय, शुद्ध सत्त्व की मूर्ति देवी! आपको नमस्कार।
—
🍁काळसर्पविनाशाय यः स्तोतुं त्वां प्रवर्तते।
तस्य जन्मकृतं पापं भस्मीभवति सानिशम्॥२
भावार्थ:
जो व्यक्ति आपको स्तुति करता है, उसका जन्मजनित कालसर्पदोष और उसके कारण के पाप — दिन-रात भस्म हो जाते हैं।
—
🍁राहुकेत्वादिदोषघ्नी शनि-शान्तिप्रदायिनी।
नागेश्वरि नमस्तुभ्यं कुरु मे ग्रहसौम्यता॥३
भावार्थ:
हे नागेश्वरी! आप राहु, केतु, और शनि आदि ग्रह-दोषों का निवारण करती हैं। मुझे भी ग्रहों की सौम्यता प्रदान करें।
🍁नागवल्ल्याः समुत्पन्ने नागिनां शक्तिरूपिणि।
लक्ष्म्याः गुह्यतमा शक्ते त्वं हि मूलाधिवासिनी॥४
भावार्थ:
हे देवी! आप नागों की मूल शक्ति हो, नागवल्ली से प्रकट हुई, लक्ष्मी का रहस्यमय स्वरूप, जो मूलाधार में अधिष्ठित हैं।
-🍁यो निष्क्रान्तो जठरात् सर्परूपेण भूतले।
तं संयच्छति या शक्तिः सा त्वमेव जगन्मयी॥५
भावार्थ:
जो सर्परूपी दोष शरीर से प्रकट होकर पृथ्वी पर कष्ट देता है, उसे रोकने वाली जो शक्ति है — वही आप, जगन्माता हैं।
-🍁सर्पपीडा, ग्रहव्यथा, भूतबाधा निवारिणि।
नागलक्ष्मि नमस्तुभ्यं सर्वदुःखविनाशिनि॥६
भावार्थ:
सर्पदोष, ग्रहपीड़ा, और अदृश्य बाधाओं को हरने वाली हे नाग लक्ष्मी! आपको बारंबार नमस्कार, आप सब दुःखों का अंत करती हैं।
-🍁मणिवज्रधरा देवी, कुण्डलिनीस्वरूपिणि।
त्वत्कृपां याचये नित्यं यतः शान्तिर्न लभ्यते॥७
भावार्थ:
हे मणि-जटित वज्रशक्ति, कुण्डलिनीस्वरूपा देवी! आपकी कृपा के बिना स्थायी शांति नहीं मिलती — इसलिए मैं नित्य आपकी कृपा चाहता हूँ।
🍁जटिलाऽसि महाशक्तिः कुण्डलीनी चिदात्मकम्।
नागेश्वरी त्वमेकैव मूलकारणतत्त्विका॥८
भावार्थ:
हे जटाजूटधारी महाशक्ति! आप ही चेतना स्वरूपिणी कुण्डलिनी हैं। नागेश्वरी, आप ही समस्त कारणों की मूल तत्वशक्ति हैं।
-🍁सप्तपातालसम्बद्धे नागलोके महामते।
सप्तचक्रविनिर्मात्रि त्वं प्राचीनविनाशिनि॥९
भावार्थ:
हे महामति नागलक्ष्मी! आप पाताल के सात लोकों में व्याप्त हैं, और शरीर के सात चक्रों की रचयिता व अज्ञान का नाश करने वाली हैं।
-🍁त्वद्भक्तो यः पठेच्छ्रद्धया स्तोत्रमेतन्मनस्विना।
तस्य जन्मज दोषाणां नाशो जायते ध्रुवम्॥१०
भावार्थ:
जो साधक श्रद्धा व ध्यान से यह स्तोत्र पढ़ता है, उसके जन्मकुंडली के समस्त दोष नष्ट हो जाते हैं — यह निश्चित है।
🍁कृष्णवर्णा महागूढा कालाग्निरूपधारिणी।
शीतांशुवदनारम्या नागिनी त्वं शिवप्रिया॥११
भावार्थ:
हे कृष्णवर्णा, रहस्यमयी देवी! आप कालाग्निरूपी हैं, किंतु शीतल चंद्रमुखी भी हैं। नागिनी रूप में आप शिव प्रिय हैं।
-🍁सिद्धयोगिन्युपास्या त्वं मायातीता महामता।
राहुकेतुग्रहच्छेदि क्रूरदृष्टिविनाशिनि॥१२
भावार्थ:
सिद्ध योगिनियाँ आपकी उपासना करती हैं। आप माया से परे हैं, और राहु-केतु की कुटिल दृष्टियों को नष्ट करने वाली हैं।
🍁मूलाधारनिवासिन्यै नमो नागेन्द्रवल्लभे।
दोषग्रहविनाशिन्यै दीनरक्षामहेश्वरि॥१३।।
भावार्थ:
मूलाधार में निवास करने वाली नागलक्ष्मी को प्रणाम है! आप ही दोषों और ग्रहों का नाश करती हैं, और दीनों की रक्षक महेश्वरी हैं।
🍁महापद्मस्थिता देवी, नागरथ्याय निर्मिता।
सर्पदंशविनाशाय त्वां वन्दे शक्तिरूपिणीम्॥१४
भावार्थ:
महापद्म पर स्थित देवी! आप नागशक्तियों के लिये ही बनी हैं। सर्पदंश जैसे अदृश्य दुष्प्रभावों को हरने हेतु मैं आपको वंदन करता हूँ।
-🍁यस्य जन्मनि वा दोषो जातकर्मविरोधकः।
त्वत्प्रसादेन नागेशि शीघ्रं शान्तिर्भवेद्ध्रुवम्॥१५
भावार्थ:
जिसके जन्म में दोष हो, जातकर्म में विरोध हों, उसके जीवन में आप की कृपा से शीघ्र ही शांति सुनिश्चित होती है।
🍁शक्तिपीठेषु गूढत्वं नागपीठे च सर्वदा।
त्वं शेषफलके देवी लक्ष्मीरूपेण संस्थिता॥१६
भावार्थ:
आप शक्तिपीठों में रहस्यरूपिणी हैं, और नागपीठों में विशेष रूप से पूज्यनीय। शेषनाग के फन पर लक्ष्मीस्वरूपा आप ही प्रतिष्ठित हैं।
🍁कण्ठे नागविभूषा या नागिन्याः अधिदेवता।
सा नागलक्ष्मि विश्वेशि त्रैलोक्यस्य च पालिका॥१७
भावार्थ:
जिन्हें नागों की माला शोभा देती है, जो समस्त नागिनियों की अधिदेवता हैं — वही आप नाग लक्ष्मी, तीनों लोकों की पालिका हैं।
🍁अष्टनागसमायुक्ता सिद्धिकामप्रदायिनी।
त्वं प्रसन्ना यदि भूयाः सर्वं सिद्धिं प्रयच्छसि॥१८
भावार्थ:
आप आठ प्रमुख नागों से युक्त हैं और सिद्धि चाहने वालों को वरदान देती हैं। यदि आप प्रसन्न हों, तो साधक को समस्त सिद्धियाँ सहज प्राप्त होती हैं।
🍁विषहरि त्वं महाशक्तिः कालदोषविनाशिनी।
त्वत्पादाम्बुजयुग्मेन सप्तलोकाः प्रशान्तयः॥१९
भावार्थ:
हे विषहरिणी महाशक्ति! आप कालदोष का नाश करती हैं। आपके चरणों के स्पर्श से सातों लोकों की पीड़ा शांत होती है।
🍁काली रूपा च सौम्या त्वं योगिनी त्रिकालगा।
नागवल्लीसमुद्भूता जगतां कारणेश्वरी॥२०
भावार्थ:
आप कभी काली रूप में हैं, तो कभी सौम्या। आप योगिनी हैं, तीनों कालों को जानने वाली, नागवल्ली से उत्पन्न, और समस्त जगत की कारणस्वरूपा देवी हैं।
🍁महादोषहरा देवि, विपत्तिनाशिनी सदा।
दुष्टग्रहसमायुक्तं जीवमुद्धर निर्भया॥२१
भावार्थ:
हे देवी! आप महान दोषों को हरने वाली और संकटों का नाश करने वाली हैं। दुष्ट ग्रहों से पीड़ित जीव को निर्भय बना दीजिए।
-🍁गुह्यविद्याधिपाराध्या गूढतत्त्वप्रकाशिनी।
नागेशि त्वं महामाया मोहिनी योगमातृका॥२२
भावार्थ:
आप रहस्य विद्याओं की अधिपति शक्तियों द्वारा पूजित हैं। गूढ़ तत्त्वों को प्रकाशित करने वाली, महामाया, मोहिनी, और योगमातृका हैं।
–
🍁भूतप्रेतपिशाचादि बाधां त्वं हन्ति सत्वरम्।
ग्रहपिशाचसंयुक्तं शुद्धं कुरु ममात्मनः॥२३
भावार्थ:
आप भूत-प्रेत और पिशाच जैसी बाधाओं को शीघ्र हरने वाली हैं। हे माता! मेरे शरीर और आत्मा को ग्रहबाधाओं से शुद्ध करें।
🍁-कदलीवननिवासे च नागतीर्थे च पूजिता।
नागवल्लीसमारूढा नागिनी त्वं कृपानिधे॥२४
भावार्थ:
आप कदलीवन, नागतीर्थ आदि स्थानों में पूजनीय हैं। नागवल्ली पर आरूढ़, नागिनी रूप में कृपानिधि हैं।
🍁मन्त्रतन्त्रप्रभावज्ञे नागिन्याः कुलदैवते।
त्वमेव भक्तनागानां चिरं रक्षां विधेहि मे॥२५
भावार्थ:
आप मंत्र-तंत्र की गूढ़ शक्ति को जानने वाली, समस्त नागिनियों की कुलदैवता हैं। कृपया अपने भक्तों की दीर्घकाल तक रक्षा करें।
🍁नमस्ते नागरूपिण्यै नागमणिप्रदायिनि।
राजयोगप्रदा देवि कालसर्पविनाशिनि॥२६
भावार्थ:
हे नागरूपा देवी! आपको नमस्कार, जो नागमणि का वरदान देती हैं। आप राजयोग देने वाली हैं और कालसर्प दोष का नाश करती हैं।
🍁सप्ततालसमाभूषे सप्तलोकविलोकिनि।
नागलक्ष्मि नमस्तुभ्यं शान्तिदात्री सुदुर्लभे॥२७
भावार्थ:
आप सप्त ताल वृक्षों से विभूषित हैं, सातों लोकों को देख सकने वाली हैं। हे नाग लक्ष्मी! आपको प्रणाम, जो दुर्लभ हैं पर शांति देती हैं।
🍁राहुग्रस्ते जनः पीड्यते भयदर्शितः।
त्वद्गुणस्मरणात् तस्य ग्रहदोषो विनश्यति॥२८
भावार्थ:
जब राहु पीड़ित करता है और व्यक्ति भयभीत होता है, तब आपका स्मरण करने से उसका ग्रहदोष नष्ट हो जाता है।
🍁केतुदोषसमायुक्तं जन्मकाले विपन्नता।
त्वत्पूजया समायाति भाग्यलक्ष्मीर्यथापुरा॥२९
भावार्थ:
जिनके जन्म में केतुदोष के कारण विपत्तियाँ आती हैं, वे आपकी पूजा से पुनः भाग्यलक्ष्मी प्राप्त करते हैं।
🍁शनिश्चरस्य कुदृष्टिर्दीर्घकालविनाशिनी।
नाशं याति त्वदीयेन नामस्मरणमात्रतः॥३०
भावार्थ:
शनि की कुदृष्टि जो दीर्घकालीन विनाश लाती है, वह आपकी महिमा के स्मरण से समाप्त हो जाती है।
🍁मङ्गलस्य च दोषेण विवाहस्थगनं भवेत्।
त्वत्कृपापातमात्रेण सौम्यं भावं लभेत्सुतः॥३१
भावार्थ:
मंगल दोष के कारण विवाह में बाधा होती है, किंतु आपकी कृपा की दृष्टि मात्र से सौम्यता प्राप्त होती है।
🍁चन्द्रदोषो यदि जायेत मानसीं व्यथनां शुभाम्।
त्वं करोषि तदुद्धारं करुणालोलया दृशा॥३२
भावार्थ:
चंद्र दोष यदि मानसिक पीड़ा लाए, तो आप उसे अपनी करुणा से मुक्त करती हैं।
🍁ग्रहणे रविचन्द्रस्य पीडा देहान्तकारिणी।
त्वमाश्रितस्य रक्षां करोषि परमेश्वरी॥३३
भावार्थ:
सूर्य और चंद्र ग्रहणों से उत्पन्न पीड़ा प्राणघातक भी हो सकती है, परंतु आप अपने शरणागत की रक्षा करती हैं।
🍁ग्रहदोषमहीभूता जन्मजन्मान्तरे (situated।)
शुद्धिं याति त्वत्स्मृतेन पातालेश्वरि शक्तये॥३४
भावार्थ:
जो ग्रहदोष जन्म-जन्मान्तर से जमा हो, वह भी आपके स्मरण से पवित्र और शांत हो जाता है, हे पातालेश्वरी शक्ति!
🍁काळसर्पेण बाध्यः सन् दोषयुक्तो नरः सदा।
तव नामजपेनैव मुक्तिं लभते निश्चितम्॥३५
भावार्थ:
जो व्यक्ति कालसर्प दोष से पीड़ित हो, वह आपके नाम-जप से निश्चित ही मुक्ति प्राप्त करता है।
🍁दशमुखस्य पीठस्थे नागराजे महाबले।
त्वं तत्रैव विलीनाख्या लक्ष्मीतत्त्वं प्रपंचकम्॥३६
भावार्थ:
दशमुख (रावण) के द्वारा पूजित नागराज के पीठ में आप विलीन होकर लक्ष्मी का वह प्रपंच रूप हैं जो सर्वव्यापी है।
🍁स्वर्णनागे रजतनागे शेषे वासुकिना सह।
त्वद्भक्तस्य गृहं नित्यं नागलक्ष्म्या समन्वितम्॥३७
भावार्थ:
स्वर्ण, रजत, शेष और वासुकि नागों के साथ, जो आपकी आराधना करता है, उसके घर में नाग लक्ष्मी की कृपा सदा निवास करती है।
🍁विविधग्रहपीडायां, विषमकालप्रवर्तने।
त्वत्स्मृत्या साधकः सद्यो मुच्यते दुःखवृत्तिभिः॥३८
भावार्थ:
ग्रह पीड़ा, विषम समय या संकटकाल में जो साधक आपका स्मरण करता है, वह शीघ्र ही समस्त दुःखों से मुक्त हो जाता है।
🍁नागवह्निसमायुक्ते हृदि रोगेऽतिदारुणे।
त्वन्मन्त्रस्मरणात् सिद्धिः, शरीरं लभते शुभम्॥३९
भावार्थ:
यदि किसी को नागविष या अग्निज्वर जैसे हृदयस्थ रोग हो, तो आपके मंत्र का स्मरण करने से उसका शरीर पुनः शुभ हो जाता है।
🍁नागयज्ञे समुद्धिष्टा नागपूजासमर्चिता।
त्वमेव देवि नागानां मूलशक्ति सनातनी॥४०
भावार्थ:
आप नागयज्ञों में आह्वान की जाती हैं, नागपूजा में पूजनीय हैं — आप ही समस्त नागों की सनातन मूलशक्ति हैं।
🍁-भूतसर्पविनाशाय त्वत्तेजो जगदाच्छादि।
सर्वं विषं निरुध्येथाः प्रलयं कुरुषे स्वयम्॥४१
भावार्थ:
भूतसर्पों के नाश हेतु आपका तेज समस्त जगत को ढक लेता है। आप समस्त विषों को रोककर आवश्यकता होने पर संहार भी कर सकती हैं।
🍁दग्धकर्माणि शुद्धानि, ग्रहाणां च प्रभावतः।
त्वत्पादपद्मसेवायां योगिनो लभते सुखम्॥४२
भावार्थ:
आपके चरणकमलों की सेवा करने से योगी अपने जले हुए (क्लेशपूर्ण) कर्मों और ग्रहदोषों से मुक्त होकर सुख पाते हैं।
🍁मन्त्रिणो वशमायान्ति तव मन्त्रबलाकुलाः।
दुष्टदृष्टयः पलायन्ते, नागलक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥४३
भावार्थ:
आपके मंत्र के प्रभाव से तंत्र-मंत्र के ज्ञाता भी प्रभावित होते हैं, और दुष्ट दृष्टियाँ भाग जाती हैं — आपको नमस्कार है।
🍁शयनं वा गमनं वा, यत्र त्वं संनिधौ भवेत्।
तत्र दुःस्वप्ननाशश्च, सुखं स्यान्निश्चलं सदा॥४४
भावार्थ:
जहाँ-जहाँ आपकी उपस्थिति होती है — वहाँ शयन, गमन सभी में अशुभ स्वप्नों का नाश और स्थायी सुख होता है।
🍁नागमणिप्रभायुक्ते, नागराजसुतासमे।
महाशक्ते जगद्वन्द्ये नागलक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥४५
भावार्थ:
नागमणि की प्रभा से युक्त, नागराज की कन्या तुल्य, जगद्वन्द्ये महाशक्ति नाग लक्ष्मी को नमन है।
🍁स्तोत्रमेतत् पठेन्नित्यं श्रद्धया यः नरः सदा।
कालसर्पभयं तस्य नास्ति जन्मकदापि च॥४६
भावार्थ:
जो व्यक्ति इस स्तोत्र को श्रद्धा से प्रतिदिन पढ़ता है, उसे जीवन में कभी भी कालसर्प या ग्रहदोष का भय नहीं होता।
🍁अदृष्टं दृश्यते तस्य, दुर्लभं लभते ध्रुवम्।
नागलक्ष्मीप्रसादेन भवबन्धो विनश्यति॥४७
भावार्थ:
जो अदृष्ट (अप्राप्य) है वह भी उसे मिलता है। नागलक्ष्मी की कृपा से संसारिक बंधन समाप्त हो जाते हैं।
🍁मातङ्गिनी च महिषी, नागेशि त्वं शिवप्रिया।
त्रैलोक्ये ते महिमा या, न तां वर्णयितुं क्षमः॥४८
भावार्थ:
आप मातंगी, महिषी (माया), और नागेश्वरी भी हैं — त्रैलोक्य में आपकी महिमा इतनी विराट है कि उसका वर्णन असंभव है।
🍁शेषशायी पतिस्ते यः, लक्ष्मी रूपेण संस्थिता।
त्वं तद्रूपवती नित्यं नागशक्त्यावेशिनी॥४९
भावार्थ:
आपके पति शेषनाग पर शयन करने वाले विष्णु हैं, और आप लक्ष्मी के रूप में ही नागशक्ति से युक्त हैं।
🍁गुह्यकव्यमिदं दिव्यं नागलक्ष्मि स्तवं शुभम्।
सप्तजन्मज दोषघ्नं पाठात् पुण्यं लभेद्ध्रुवम्॥५०
भावार्थ:
यह रहस्यमय दिव्य स्तोत्र सप्तजन्मों के पापों और दोषों को हरने वाला है। इसका पाठ निश्चित रूप से पुण्यप्रद होता है।
🍁नागलक्ष्मि सदाश्रये, करुणारसपूरिते।
शरणं तव याचेऽहं, मां रक्ष सुविशालये॥५१
भावार्थ:
हे करुणारसपूर्ण नागलक्ष्मी! मैं सदा आपकी शरण में रहता हूँ, आप मेरी रक्षा करें — हे विशाल, असीम रूपिणी माता!
🍁नागराज अनंत प्रियाम् दिव्यां स्वर्णसिंहासनस्थिताम्।
नागमण्यभूषिताङ्गीं नागलक्ष्मीं नमाम्यहम्॥५२
भावार्थ
जो नागराज अनंत की पत्नी हैं, दिव्य स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं,
नागमणियों से सुसज्जित उनके अंग हैं—ऐसी नागलक्ष्मी को मैं नमन करता हूँ।
. 🍁चक्रं शङ्खं च धारयन्तीं, पद्मकल्पां सुधाकराम्।
सर्वमङ्गलदां देवीं नागलक्ष्मीं नमाम्यहम्॥५३
भावार्थ
जो चक्र और शंख धारण करती हैं, कमल और अमृत कलश लिए हुए हैं,
जो सम्पूर्ण मंगल प्रदान करती हैं—ऐसी देवी नागलक्ष्मी को मैं नमन करता हूँ।
्🍁त्रिनेत्रां चन्द्रवदनां नागाभरणभूषिताम्।
मयूरकण्ठसम्भूषां नागलक्ष्मीं नमाम्यहम्॥५४
भावार्थ
तीन नेत्रों वाली, चन्द्र समान मुख वाली, नागों के आभूषणों से सुशोभित,
मोरपंख मुकुट से सुशोभिता—ऐसी नागलक्ष्मी को मैं प्रणाम करता हूँ।
🍁अनन्तशयिनी लक्ष्मीः संकर्षणप्रिया सदा।
योगिनां ध्येयरूपा च नागलक्ष्मीं नमाम्यहम्॥५५
भावार्थ
जो अनन्त शय्या पर विराजमान नारायण की अर्धांगिनी हैं,
संकर्षण को प्रिय हैं, योगियों द्वारा ध्यान की जाने योग्य हैं—उन नागलक्ष्मी को मैं नमन करता हूँ।
🍁फलश्रुति
यः पठेत् स्तोत्रमेतद्वै भक्त्या नागलक्ष्म्याः सदा।
लभते सम्पदं दिव्यां नागदोषं विनाशयेत्॥५६
जो व्यक्ति इस स्तोत्र को श्रद्धा से पढ़ता है, उसे दिव्य संपत्ति प्राप्त होती है और नागदोष नष्ट होता है।
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02..🌷🌷॥ श्रीनाग लक्ष्मी कवचम् ॥ 🌷🌷🌷
ध्यानम्
शान्ता पद्मासना देवी नागछत्रसमन्विता।
हरिचक्रधरा शुभ्रा नागलक्ष्मी नमोऽस्तु ते॥
१. नागलक्ष्मी शिरः पातु, ज्ञानशक्ति प्रदायिनी।
२. ललाटे नागमणिरूपा, सदा सौम्या शुभप्रदा॥
३. नेत्रयोः कालरात्रिश्च, नासायां नागवल्लरी।
४. कण्ठे नागेश्वरी रक्षेत्, वाणीं देव्याः सदा गति॥
५. हृदये कुण्डली रक्षेत्, नाभौ श्रीशेषवासिनी।
६. गुह्ये च महाशक्तिः स्यात्, मूलाधारनिरेश्वरी॥
७. बाहुयोः विषहरा पातु, पृष्ठे नागमातृका।
८. पादयोर्नागयज्ञस्था, सर्वांगी मे सदाऽवतु॥
फलश्रुति:
यं यं चिन्तयते भावं, तं तं लभते नरः।
नागलक्ष्मी कवचस्य पाठात् सिद्धिर्भवति निश्चितम्॥
हिंदी सार:
जो साधक यह कवच श्रद्धा से पढ़ता है, उसकी बुद्धि, शरीर, वाणी, चित्त, और जीवन सभी पर नागलक्ष्मी की कृपा बनती है। वह विष, भय, ग्रहदोष, मानसिक क्लेश, और आत्मिक दुर्बलता से मुक्त हो जाता है।
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03..🌷🌷नागलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली 🌷🌷🌷
(नागलक्ष्मी के १०८ नाम)
(प्रत्येक नाम के श्री और पीछे नमः लगाकर पाठ करें )
नागब्रह्माणि नागवैष्णवी नागमाहेश्वरी
नागकौमारि नागविनायकी नागबाराहि
नागशांकरि नागइन्द्राणि नागकंकालि
सर्वनागकरालि नागकालि नागमहाकालि
नागचामुण्डे नागज्वालामुखि नागकामाख्ये
नागकपालिनि नागभद्रकालि नागदुर्गे
नागाम्बिके नागललिते नागगौरि
नागसुमंगले नागरोहिणि नागकपिले
.नागशूलकरे नागकुण्डलिनि नागत्रिपुरे
नागभैरवि नागभद्रे नागचन्द्रावलि ।।३०।।
नागनारसिंहि नागनिरञ्जने नागहेमकान्ते
नागप्रेतासने नागईशानि नागवैश्वानरि
नागचन्डी नागशीतला नागयमघण्टे
नागहरसिद्धे नागसरस्वति नागतोतुले
नागवन्दिनि नागशंखिनि नागपद्मिनि
नागचित्रिणि नागवारुणि नागचण्डि
नागवनदेवि नागयमभगिनि नागगंगा
नागनर्मदा नागसरस्वती,नागअपराजिते
नागनारायणी, नागपीताम्बरा, नागसंजीवनी
नागतुलसी, नागचंपा, नागकमला।।६०।।
श्री नागसुन्दरि नागलोकेश्वरी नागास्त्रधारिणी
नागकेशा नागनेत्रा नागरूपा
नागास्त्रसिद्धिदायिनी नागरथारूढ़ा नागवाहिनी नागपाशबंधिनी नागपाशविमोचनी , नागेश्वरि
शेषमयी वासुकीमयि कार्कोटकमयि
शंखमयि जरत्कारुमयि ऐरावतमयि
कम्बलमयि धनन्जयमयि महानीलमयि
पद्ममयि अश्वतरमयि तक्षकमयि
एलापत्रमयि महापद्ममयि धृतराष्ट्रमयि
शंखपालमयि पुष्पदंतमयि अनन्तमयि।।९०।।
असिताङ्ग भैरवमयि, रुरुभैरवमयि ,चण्डभैरवमयि क्रोधभैरवमयि उन्मत्तभैरवमयि ,भीषणभैरवमयि संहारभैरवमयि कालभैरवमयि आकाशभैरवमयि
नारायणभैरवमयि।।१००।।
उर्मिला, रेवती रूक्मिणी राधिका जानकी पदमावती
जगद्धात्री, शेषाशायीप्रिया ।।१०८।।
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🌷🌷नागलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली 2 🌷🌷🌷
(नागलक्ष्मी के १०८ नाम)
नाग लक्ष्मी के 108 यह नाम दुर्लभ हैं, क्योंकि वे पारंपरिक ग्रंथों में विस्तार से नहीं मिलते।
नीचे आपको नाग लक्ष्मी से संबंधित प्रमुख नाम और उनकी शक्तियों के आधार पर 108 नामों का एक और सुंदर संग्रह प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो नाग लक्ष्मी की महिमा, स्वरूप और ऊर्जा को समर्पित हैं।
नाग लक्ष्मी के 108 दिव्य नाम
1. ओम नागलक्ष्म्यै नमः
2. ओम नागराज्ञाय नमः
3. ओम वासुकी रूपायै नमः
4. ओम शेषनागायै नमः
5. ओम अनंतनागायै नमः
6. ओम पद्मनागायै नमः
7. ओम कूर्मनागायै नमः
8. ओम मकरनागायै नमः
9. ओम ध्रुवनागायै नमः
10. ओम सुन्दरनागाय नमः
11. ओम कपालिन्यै नमः
12. ओम कालसर्पघ्न्यै नमः
13. ओम राहुप्रणाशिन्यै नमः
14. ओम केतुविनाशिन्यै नमः
15. ओम नागभक्तिप्रदायिन्यै नमः
16. ओम नागेश्वर्यै नमः
17. ओम नागनवदुर्गायै नमः
18. ओम नागमणिप्रदायिन्यै नमः
19. ओम नाग अष्टमातृकायै नमः
20. ओम नागविलोकनाय नमः
21. ओम नागमुक्तिदायिन्यै नमः
22. ओम नागराज्ञ्यै नमः
23. ओम नागवैष्णव्यै नमः
24. ओम नागसौख्यदायिन्यै नमः
25. ओम नागचन्द्रिकायै नमः
26. ओम नागशक्त्यै नमः
27. ओम नागानन्दप्रदायिन्यै नमः
28. ओम नागवात्सल्यायै नमः
29. ओम नागविभूत्यै नमः
30. ओम नागदेव्यै नमः
31. ओम नागसर्वशक्त्यै नमः
32. ओम नागशिवायै नमः
33. ओम नागललितायै नमः
34. ओम नागसुन्दर्यै नमः
35. ओम नागप्रियायै नमः
36. ओम नागविभागाय नमः
37. ओम नागद्वीपाय नमः
38. ओम नागपुरुषायै नमः
39. ओम नागपुत्राय नमः
40. ओम नागसखी नमः
41. ओम नागविद्यायै नमः
42. ओम नागकन्यायै नमः
43. ओम नागरूपिण्यै नमः
44. ओम नागमहालक्ष्म्यै नमः
45. ओम नागदक्षिणाय नमः
46. ओम नागप्रियायै नमः
47. ओम नागधारिण्यै नमः
48. ओम नागजिन्यै नमः
49. ओम नागसंपत्प्रदायिन्यै नमः
50. ओम नागप्रीत्यै नमः
51. ओम नागसुखदायिन्यै नमः
52. ओम नागसौभाग्यदायिन्यै नमः
53. ओम नागप्रसन्नाय नमः
54. ओम नागकल्याणाय नमः
55. ओम नागचैतन्याय नमः
56. ओम नागशान्त्यै नमः
57. ओम नागसहाय्यै नमः
58. ओम नागमुक्त्यै नमः
59. ओम नागकल्याणकारिण्यै नमः
60. ओम नागविकासनाय नमः
61. ओम नागप्रकाशाय नमः
62. ओम नागभक्तिप्रदायिन्यै नमः
63. ओम नागविज्ञानाय नमः
64. ओम नागशौर्याय नमः
65. ओम नागविश्वसिन्यै नमः
66. ओम नागभयहराय नमः
67. ओम नागकृपाय नमः
68. ओम नागसर्वदोषनाशाय नमः
69. ओम नागकालसर्पघ्न्यै नमः
70. ओम नागशिवस्वरूपिण्यै नमः
71. ओम नागविभूषिताय नमः
72. ओम नागसंपत्स्वामिन्यै नमः
73. ओम नागरूपिण्यै नमः
74. ओम नागमणिप्रदायिन्यै नमः
75. ओम नागदर्शिन्यै नमः
76. ओम नागप्राणदायिन्यै नमः
77. ओम नागसुखप्रदायिन्यै नमः
78. ओम नागप्रज्ञाय नमः
79. ओम नागमंगलायै नमः
80. ओम नागविलोकनाय नमः
81. ओम नागसुखसंप्रदायिन्यै नमः
82. ओम नागशक्ति प्रदा नमः
83. ओम नागराजलक्ष्मी नमः
84. ओम नागराज्ञ्यै नमः
85. ओम नागरक्षकाय नमः
86. ओम नागरूपिण्यै नमः
87. ओम नागदेव्यै नमः
88. ओम नागभक्तिप्रदायिन्यै नमः
89. ओम नागसंपत्स्वामिन्यै नमः
90. ओम नागशिवायै नमः
91. ओम नागकन्यायै नमः
92. ओम नागमणिप्रदायिन्यै नमः
93. ओम नागभयहराय नमः
94. ओम नागविभूतिप्रदायिन्यै नमः
95. ओम नागसर्वशक्त्यै नमः
96. ओम नागप्रीत्यै नमः
97. ओम नागविनाशनाय नमः
98. ओम नागदुर्गायै नमः
99. ओम नागशक्त्यै नमः
100. ओम नागमातृकायै नमः
101. ओम नागसर्वप्रसन्नाय नमः
102. ओम नागसमृद्धिदायिन्यै नमः
103. ओम नागसंपत्प्रदायिन्यै नमः
104. ओम नागशुभदायिन्यै नमः
105. ओम नागसर्वधर्मप्रदायिन्यै नमः
106. ओम नागसर्वरक्षणाय नमः
107. ओम नागमुक्तिदायिन्यै नमः
108. ओम नागराजराजेश्वरी लक्ष्म्यै नमः
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🍁नाग लक्ष्मी मंत्र या स्तोत्र अनुष्ठान/ पूजा के निर्देश 🍁
नाग लक्ष्मी पूजा एवं साधना विधि
(कालसर्प दोष व ग्रहदोष निवारण हेतु)
नाग लक्ष्मी मंत्र या स्तोत्र अनुष्ठान हेतु. साधना का समय व अवधि:
श्रेष्ठ समय: –कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (नाग दीपावली)
नागपंचमी, श्रावण मास, अमावस्या, शनिवार, या राहु काल में। अनुष्ठान हेतु कुल अवधि: 11, 21 या 51 दिन।
(बाकी जो साधना नहीं करते वह नित्य पूजा में अपने अनुसार स्तोत्र या मंत्र जप कर सकते हैं )
आवश्यक सामग्री:
नाग लक्ष्मी यंत्र या श्रीयंत्र शालिग्राम
पीला आसन, सफेद वस्त्र
चंदन, नागकेसर, श्वेत पुष्प, अक्षत, दीपक, धूप।
काले तिल, दुग्ध या जल से भरा नागकलश (तांबे का लोटा)।
संकल्प (हाथ में जल लेकर):
(हिंदी में बोलें)
“ॐ सर्वग्रह दोष निवारणं, कालसर्प पीड़ा शमनं, चित्तशुद्धि, समृद्धि, और नाग लक्ष्मी कृपा प्राप्त्यर्थं, अनेन साधनायामहं संकल्पयामि।”
ध्यान मंत्र (त्राटकपूर्वक):
ध्यानम्:
श्वेतवर्णा पद्मासनस्था, नागमाल्यविभूषिता।
अष्टभुजा शंखचक्रगदा, नागलक्ष्मी नमोऽस्तु ते॥
पूजन क्रम:
1. गुरु मंत्रजप स्मरण/गणपति पूजन – विघ्न शांति हेतु।
नवग्रह/पंचदेव/कुलदेव/ईष्ट देव स्मरण
2. नागदेवता आवाहन – शेषनाग, वासुकि, तक्षक आदि का स्मरण।
3. नाग लक्ष्मी आवाहन और पंचोपचार पूजन।
4. कवच-पाठ, फिर स्तोत्र-पाठ।
5. मूल मंत्र जप या स्तोत्र पाठ करें।
मालाः: रुद्राक्ष /रक्त चंदन/कमलगट्टा माला (या साधारण माला)
6. अंत में प्रार्थना और क्षमायाचन।
अंतिम चरण – समर्पण मंत्र:
ॐ नागलक्ष्मी नमस्तुभ्यं, नागराजाय ते नमः।
सर्पिणी सुरम्यवक्त्रे, नागभक्तिप्रदायिनि॥
कालसर्पदोष नाशाय, जन्मकुण्डली शोधनाय।
राहुकेतुभयहराय, नागलक्ष्म्यै नमो नमः॥
अर्थ:–नाग लक्ष्मी, आपको प्रणाम।
आप नागराज की शक्ति हैं, जो नाग भक्तों को अनुग्रहित करती हैं।
कालसर्प दोष और जन्मकुंडली के दोषों को दूर करने वाली, राहु-केतु के भय को हरने वाली नाग लक्ष्मी को मेरा नमन।
प्रार्थना
हे नागलक्ष्मी! एवं भगवान नारायण मेरी साधना में जो त्रुटियाँ हों, उन्हें क्षमा करें। मुझे आपकी कृपा का पात्र बनाएं। हे
लक्ष्मी नारायण मुझे ग्रहदोषों से मुक्त कर सुख, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करें।”
सबसे अंत में भगवान विष्णु की स्तुति करें
🍁🍁भगवान विष्णु की स्तुति 🍁🍁🍁
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभ्यहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
अर्थ:
जो शांत स्वरूप है, जो विशाल सर्प के ऊपर लेटे हुए हैं, जिनकी नाभि से कमल का फूल निकला है, जो सब देवों के देव हैं, जो संपूर्ण सृष्टि का आधार हैं, जो आकाश की तरह विशाल हैं, मेघों के समान रंग वाले हैं, सुंदर शरीर वाले हैं,
जो भगवती लक्ष्मी के पति हैं। जिनके कमल जैसे सुंदर नेत्र
हें। जिनके मूल ब्रह स्वरूप को सिद्ध योगी ऋषि भी ध्यान द्वारा पूर्ण रूप से नहीं जानते
मैं ऐसे विष्णु को प्रणाम करता हूं जो सांसारिक भय को दूर करते हैं और सभी लोकों के एकमात्र स्वामी हैं.
पूजा हवन करवाने से कई गुना ज्यादा फल प्राप्त होता हैं।
७. विशेष निर्देश:
पूजा के बाद प्रसाद के रूप में मिठाई या फल वितरण करें।
जप पूर्ण करने के बाद दीपक बुझाएं नहीं — स्वयं शांत होने दें।
यदि आप सक्षम हो तो अनुष्ठान करने के बाद
21 या 51 दिन में एक दिन “नाग भोज/नाग दान” गुरु जी व गरीब ब्राह्मण/पुजारियों को “नाग वस्त्र” (काले वस्त्र) दान करें। अथवा किसी मंदिर में एक पुजारी को यथासंभव दान
दक्षिणा दे।
सावधानी: इस साधना में निंदा, मांस, मद्य या अहंकार वर्जित है।
पूजा हवन यन्त्र माला अनुष्ठान के लिए contact करें
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और उसके दाहिनी तरफ भगवान शिव जी और अपने गुरु की फोटो स्थापित करें ! उसके बाद यन्त्र के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाकर यंत्र का पूजन करें और मन्त्र विधान अनुसार संकल्प आदि कर सीधे हाथ में जल लेकर




