कमला लक्ष्मी देवी
The Lakshmi Gayatri Mantra is a sacred chant dedicated to Goddess Lakshmi, the deity of wealth, prosperity, and fortune, combining her blessings with the power of the Gayatri mantra. It is chanted to attract abundance, peace, and spiritual growth, often recited 108 times for maximum benefits in front of Lakshmi Yantra.
Lyrics (Sanskrit):
Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe
Vishnu Patnyai Cha Dheemahi
Tanno Lakshmi Prachodayat.
Meaning:
“Om, Let me meditate on the greatest Goddess, the wife of Lord Vishnu. Oh, Goddess Lakshmi, give me a higher intellect and enlighten my life with abundance and prosperity”.
Benefits and Usage:
Wealth & Success: Regularly chanting this mantra helps attract prosperity, fortune, and material comforts.
Mental Peace: The, Mahakatha states that it fosters a positive mindset and removes, Mantra4u says it infuses, positive energy.
Timing: Often recited during daily prayers, meditation, or special occasions like Diwali.
|| राजराजेश्वरी शनि–लक्ष्मी स्तवनम् ||
मंत्र सिद्ध लक्ष्मी व शनि यँत्र स्थापना कर के साधना करनी आवश्यक होती हैं।
ॐ अस्य श्रीशनि–राजलक्ष्मी–स्तवनमन्त्रस्य ।
ऋषिः – नारदःछन्दः – अनुष्टुप्
देवता – श्रीशनि–नारायणसमन्विता राजलक्ष्मीः
बीजम् – श्रीम् शक्तिः – नमः
कीलकम् – कर्मशुद्ध्यर्थे
विनियोगः –
शनि-दोष-शमन, कर्मशुद्धि, राज्य-सम्मान, स्थैर्य-लक्ष्मी-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः ॥
करन्यास
ॐ श्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ नमः तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ शनि–लक्ष्म्यै मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ राजलक्ष्म्यै अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ नारायणसमन्वितायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ न्यायधर्मस्वरूपिण्यै करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥
हृदयादि न्यास
ॐ श्रीशनि–राजलक्ष्म्यै हृदयाय नमः ।
ॐ न्यायरूपिण्यै शिरसे स्वाहा ।
ॐ कर्मसाक्षिण्यै शिखायै वषट् ।
ॐ वैष्णव्यै कवचाय हुम् ।
ॐ गरुडध्वजसंरक्षितायै नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ शनि–नारायणसमन्वितायै अस्त्राय फट् ॥
दिग्बन्धन (अत्यन्त संक्षिप्त)
ॐ भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
श्रीशनि–राजलक्ष्मी ध्यान-श्लोक
नीलश्यामां महागम्भीरां राजसिंहासनस्थिताम्।
चरणाधः नीलपद्मस्थां गरुडारूढसंश्रिताम्॥
वलयांकित-शनि-मण्डलां पृष्ठे तेजोविभूषिताम्।
ऊर्ध्वे धर्मतुलाधारां पादे भिन्नशृङ्खलाम्॥
दण्ड-नीलकमल-हस्तां वराभयकरान्विताम्।
शनि–नारायण–समन्वितां राजलक्ष्मीं नमाम्यहम्॥
नमस्ते राजराजेशि शनि–नारायणसंयुते।
कर्मसाक्षिणि देवेशि शरणं ते नमो नमः॥१
अर्थ – हे राजराजेश्वरी, शनि और नारायण से संयुक्त देवी! आप कर्मों की साक्षी हैं, मैं आपकी शरण में हूँ।
नीलश्यामे महागम्भीरे सिंहासनसमाश्रिते।
न्यायधर्मप्रदे देवि शनि–लक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥२
अर्थ – नीलवर्ण, गम्भीर, सिंहासनस्थ देवी! आप न्याय और धर्म प्रदान करती हैं।
वलयांकित-शनि-मण्डले स्थिते कर्मफलप्रदे।
शुभाशुभविवेकेशि पालयस्व नमोऽस्तु ते॥३
अर्थ – शनि-मण्डल में स्थित होकर कर्मफल देने वाली देवी! हमें विवेकपूर्वक सुरक्षित रखें।
राजलक्ष्मि नमस्तुभ्यं स्थैर्य–सम्मानदायिनि।
दारिद्र्यदुःखशमन्यै शनि-शक्त्यै नमो नमः॥४
अर्थ – हे राजलक्ष्मी! आप स्थायी समृद्धि और सम्मान देने वाली हैं।
भिन्नशृङ्खलपादाब्जे कर्मबन्धविमोचिनि।
ऋणशोकभयच्छेदि प्रणमामि पुनः पुनः॥५
अर्थ – आपके चरणों में कर्म-बन्धन टूटते हैं, आप ऋण, शोक और भय हरती हैं।
दण्डनीलकमलधरे वराभयकरान्विते।
संयमशक्तिसंयुक्ते मातस्ते नमो नमः॥६
अर्थ – दण्ड और नीलकमल धारण करने वाली, वर और अभय देने वाली देवी को नमस्कार।
गरुडध्वजसंरक्ष्ये वैष्णवी न्यायरूपिणि।
शनि-दोषप्रशमन्यै राजेश्वरि नमो नमः॥७
अर्थ – गरुड़ द्वारा संरक्षित वैष्णवी देवी! आप शनि-दोष का शमन करती हैं।
राजकार्यविजयप्रदे धर्ममार्गप्रदर्शिनि।
मानसम्मानवृद्ध्यर्थं त्वामहं शरणं गतः॥८
अर्थ – हे देवी! राजकीय कार्यों में विजय और धर्ममार्ग प्रदान करें।
कालो बाधते यस्य न दरिद्र्यं न विघ्नता।
त्वत्प्रसादेन देवेशि तं पालय नमो नमः॥९
अर्थ – आपकी कृपा से काल, दरिद्रता और विघ्न बाधा नहीं बनते।
राजराजेश्वरी देवि शनि–लक्ष्मि नमोऽस्तु ते।
कर्मशुद्धिं फलं मोक्षं देहि मातर्नमोऽस्तु ते॥१०
अर्थ – हे राजराजेश्वरी शनि-लक्ष्मी! हमें कर्म-शुद्धि, उचित फल और मोक्ष प्रदान करें।
फलश्रुति
यः पठेत् श्रद्धया नित्यं शनि–लक्ष्मी स्तवं शुभम्।
स लभेत् स्थिरराज्यं च कर्मशान्तिं शुभां श्रियम्॥११
अर्थ – जो श्रद्धा से इस स्तवन का नित्य पाठ करता है, उसे कर्मशांति, स्थिर समृद्धि और सम्मान प्राप्त होता है।
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